कविता — भाग १
भाग १ — परशुराम का रौद्र आगमन
परशुराम का भयानक रूप देखकर सभा के सब राजा डर से उठ खड़े होते हैं और प्रणाम करते हैं। जनक उन्हें समाचार सुनाते हैं। हर पंक्ति पर टैप कर अर्थ देखिए।
देखत भृगुपति । उठे सकल भय ॥ पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब ॥ जनक बहोरि आइ । सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥ दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। मेले दोउ भाई॥ रामु लखनु दसरथ के । दीन्हि असीस देखि भल ॥ रामहि चितइ रहे । रूप अपार ॥
बहुरि बिलोकि सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ॥
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन सब आए॥ सुनत बचन फिरि । देखे ॥ बोले बचन कठोरा। कहु जनक धनुष कै तोरा॥ न त आजू। जहँ लहि तव राजू॥ अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल ॥ मन पछिताति । बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥ भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। बीता॥
लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
रुकिए और सोचिए —
"अरध निमेष कलप सम बीता" से क्या भाव है?
Q1.परशुराम का भयानक रूप देखकर सभा के राजाओं की क्या दशा हुई?
भाग १ — परशुराम का रौद्र आगमन
परशुराम का भयानक रूप देखकर सभा के सब राजा डर से उठ खड़े होते हैं और प्रणाम करते हैं। जनक उन्हें समाचार सुनाते हैं। हर पंक्ति पर टैप कर अर्थ देखिए।
देखत भृगुपति । उठे सकल भय ॥ पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब ॥ जनक बहोरि आइ । सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥ दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। मेले दोउ भाई॥ रामु लखनु दसरथ के । दीन्हि असीस देखि भल ॥ रामहि चितइ रहे । रूप अपार ॥
बहुरि बिलोकि सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ॥
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन सब आए॥ सुनत बचन फिरि । देखे ॥ बोले बचन कठोरा। कहु जनक धनुष कै तोरा॥ न त आजू। जहँ लहि तव राजू॥ अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल ॥ मन पछिताति । बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥ भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। बीता॥
लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
रुकिए और सोचिए —
"अरध निमेष कलप सम बीता" से क्या भाव है?
Q1.परशुराम का भयानक रूप देखकर सभा के राजाओं की क्या दशा हुई?