यात्रा — भाग १
भाग १ — आखिरी चट्टान और तीन सागर
लेखक भारत की धरती की आखिरी चट्टान पर खड़ा है — जहाँ तीन सागर मिलते हैं और जहाँ कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी।
कन्याकुमारी। सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि। केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ़, समुद्र के अंदर से उभरी चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी— इन तीनों के -सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी, हर तरफ़ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी -सी लग रही थी।
हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें मेरे आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। मैं देख रहा था और अपनी पूरी से महसूस कर रहा था— शक्ति का , विस्तार की शक्ति। तीनों तरफ़ से तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा— बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी।
रुकिए और सोचिए —
कन्याकुमारी की वह चट्टान किन तीन सागरों के संगम पर है?
"शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति" — इन कुछ शब्दों में लेखक समुद्र को देखकर क्या गहरा भाव व्यक्त कर रहा है?
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Q1.उस आखिरी चट्टान पर कभी किसने समाधि लगाई थी?
भाग १ — आखिरी चट्टान और तीन सागर
लेखक भारत की धरती की आखिरी चट्टान पर खड़ा है — जहाँ तीन सागर मिलते हैं और जहाँ कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी।
कन्याकुमारी। सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि। केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ़, समुद्र के अंदर से उभरी चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी— इन तीनों के -सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी, हर तरफ़ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी -सी लग रही थी।
हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें मेरे आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। मैं देख रहा था और अपनी पूरी से महसूस कर रहा था— शक्ति का , विस्तार की शक्ति। तीनों तरफ़ से तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा— बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी।
रुकिए और सोचिए —
कन्याकुमारी की वह चट्टान किन तीन सागरों के संगम पर है?
"शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति" — इन कुछ शब्दों में लेखक समुद्र को देखकर क्या गहरा भाव व्यक्त कर रहा है?
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Q1.उस आखिरी चट्टान पर कभी किसने समाधि लगाई थी?