यात्रा — भाग ३
लौटते समय ज्वार से पानी बढ़ने लगता है और लेखक को संघर्ष करना पड़ता है। फिर अगली सुबह वह विवेकानंद चट्टान पर सूर्योदय देखता है — और वहाँ के बेकार नवयुवकों से मिलता है।
एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई, तो मुझे ख़तरे का एहसास हुआ। मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। एक ऊँची चट्टान थी। वक़्त पर अपने को सँभालने की कोशिश की, फिर भी उससे टकरा गया। बाँहों पर हल्की आ गई, पर ज़्यादा चोट नहीं लगी। मन से डर निकल जाने से मुझे अपने आप काफ़ी हल्का लगा और मैं चट्टान से नीचे कूद गया।
सूर्योदय। हम आठ आदमी "विवेकानंद चट्टान" पर बैठे थे, जहाँ बंगाल की खाड़ी की सीमा समाप्त होती है। मेरे अलावा कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक ग्रेजुएट था। चार थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में हमें वहाँ लाए थे। नाव क्या थी, रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था, बस। नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ़ ला रहे थे, तो मैंने आसमान की तरफ़ देखते हुए उतनी देर अपनी चेतना को स्थगित रखने की चेष्टा की थी, अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढक रखना चाहा था। ग्रेजुएट नवयुवक ने मुझे बताया था कि कन्याकुमारी की आठ हज़ार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो हैं। एक कह रहा था— "हम लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और सिद्धांतों पर बहस करते हैं। इस चट्टान से इतनी प्रेरणा तो हमें मिलती ही है।"
रुकिए और सोचिए —
कन्याकुमारी के शिक्षित नवयुवकों की मुख्य समस्या क्या थी?
पूरे वृत्तांत में लेखक का मन एक ओर समुद्र की भव्यता में डूबता है, और दूसरी ओर अंत में "बसों का टाइम-टेबल" दोहराता रहता है — "तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी..."। यह विरोधाभास क्या दिखाता है?
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Q1.लौटते समय लेखक को किस बात से ख़तरे का एहसास हुआ?
लौटते समय ज्वार से पानी बढ़ने लगता है और लेखक को संघर्ष करना पड़ता है। फिर अगली सुबह वह विवेकानंद चट्टान पर सूर्योदय देखता है — और वहाँ के बेकार नवयुवकों से मिलता है।
एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई, तो मुझे ख़तरे का एहसास हुआ। मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। एक ऊँची चट्टान थी। वक़्त पर अपने को सँभालने की कोशिश की, फिर भी उससे टकरा गया। बाँहों पर हल्की आ गई, पर ज़्यादा चोट नहीं लगी। मन से डर निकल जाने से मुझे अपने आप काफ़ी हल्का लगा और मैं चट्टान से नीचे कूद गया।
सूर्योदय। हम आठ आदमी "विवेकानंद चट्टान" पर बैठे थे, जहाँ बंगाल की खाड़ी की सीमा समाप्त होती है। मेरे अलावा कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक ग्रेजुएट था। चार थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में हमें वहाँ लाए थे। नाव क्या थी, रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था, बस। नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ़ ला रहे थे, तो मैंने आसमान की तरफ़ देखते हुए उतनी देर अपनी चेतना को स्थगित रखने की चेष्टा की थी, अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढक रखना चाहा था। ग्रेजुएट नवयुवक ने मुझे बताया था कि कन्याकुमारी की आठ हज़ार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो हैं। एक कह रहा था— "हम लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और सिद्धांतों पर बहस करते हैं। इस चट्टान से इतनी प्रेरणा तो हमें मिलती ही है।"
रुकिए और सोचिए —
कन्याकुमारी के शिक्षित नवयुवकों की मुख्य समस्या क्या थी?
पूरे वृत्तांत में लेखक का मन एक ओर समुद्र की भव्यता में डूबता है, और दूसरी ओर अंत में "बसों का टाइम-टेबल" दोहराता रहता है — "तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी..."। यह विरोधाभास क्या दिखाता है?
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Q1.लौटते समय लेखक को किस बात से ख़तरे का एहसास हुआ?