यात्रा — भाग २
सूर्यास्त देखने के लिए लेखक "सैंड हिल" (बालू का टीला) की ओर बढ़ता है — एक टीले के बाद दूसरा, और हर बार लगता है अगला ही आख़िरी होगा।
जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला सामने फैला दिखाई दे गया— वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो। अपने प्रयत्न की से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया— ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ़ मैंने, उस चोटी को पहली बार हो।
कितने ही रंग वे थे। एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग, और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। लगा जैसे रेत पहली बार उन निशानों से टूटा हो। इससे मन में एक भी हुई, हल्की उदासी भी घिर आई।
एक साधारण रेत के टीले पर पहुँचकर लेखक को "संसार की सबसे ऊँची चोटी सर करने" जैसा सुख क्यों मिला?
रंगीन रेत और डूबते सूर्य को देखकर लेखक के मन में "सिहरन" के साथ "हल्की उदासी" भी घिर आती है। इतने सुंदर दृश्य पर उदासी क्यों?
Take a moment to form your answer before reading further.
Q1.सूर्यास्त देखने के लिए लेखक किस ओर बढ़ता रहा?
सूर्यास्त देखने के लिए लेखक "सैंड हिल" (बालू का टीला) की ओर बढ़ता है — एक टीले के बाद दूसरा, और हर बार लगता है अगला ही आख़िरी होगा।
जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला सामने फैला दिखाई दे गया— वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो। अपने प्रयत्न की से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया— ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ़ मैंने, उस चोटी को पहली बार हो।
कितने ही रंग वे थे। एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग, और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। लगा जैसे रेत पहली बार उन निशानों से टूटा हो। इससे मन में एक भी हुई, हल्की उदासी भी घिर आई।
एक साधारण रेत के टीले पर पहुँचकर लेखक को "संसार की सबसे ऊँची चोटी सर करने" जैसा सुख क्यों मिला?
रंगीन रेत और डूबते सूर्य को देखकर लेखक के मन में "सिहरन" के साथ "हल्की उदासी" भी घिर आती है। इतने सुंदर दृश्य पर उदासी क्यों?
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Q1.सूर्यास्त देखने के लिए लेखक किस ओर बढ़ता रहा?