कविता — भाग २ (पिता का चित्र)
अब कवि पिता को याद करता है — जो बाहर से वज्र-से कठोर और बहादुर हैं, पर भीतर से मक्खन-से कोमल। और फिर याद आता है कि पिता उस "पाँचवें बेटे" (कवि) के लिए कितना तरसते होंगे। हर पंक्ति पर टैप कीजिए।
पिताजी भोले बहादुर, , पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें,
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा, जिसे सोने पर सुहागा,
रुकिए और सोचिए —
"वज्र-भुज नवनीत-सा उर" से पिता का कैसा चरित्र उभरता है?
कवि पिता के चरित्र में दो विपरीत बातें एक साथ दिखाता है — वज्र-सी कठोर भुजाएँ और मक्खन-सा कोमल हृदय; मौत से न डरने वाला साहस और पाँचवें बेटे के लिए बहते आँसू। यह "बहुआयामी" चित्रण पिता को कैसा इंसान बनाता है?
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Q1.कविता में पिता के बुढ़ापे के बारे में क्या कहा गया है?
अब कवि पिता को याद करता है — जो बाहर से वज्र-से कठोर और बहादुर हैं, पर भीतर से मक्खन-से कोमल। और फिर याद आता है कि पिता उस "पाँचवें बेटे" (कवि) के लिए कितना तरसते होंगे। हर पंक्ति पर टैप कीजिए।
पिताजी भोले बहादुर, , पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें,
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा, जिसे सोने पर सुहागा,
रुकिए और सोचिए —
"वज्र-भुज नवनीत-सा उर" से पिता का कैसा चरित्र उभरता है?
कवि पिता के चरित्र में दो विपरीत बातें एक साथ दिखाता है — वज्र-सी कठोर भुजाएँ और मक्खन-सा कोमल हृदय; मौत से न डरने वाला साहस और पाँचवें बेटे के लिए बहते आँसू। यह "बहुआयामी" चित्रण पिता को कैसा इंसान बनाता है?
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Q1.कविता में पिता के बुढ़ापे के बारे में क्या कहा गया है?