निबंध — भाग १
भाग १ — पूर्णता में एक दरार
निबंध की शुरुआत में लेखक बताता है कि वह घर → पड़ोस → नगर से जुड़कर एक "पूर्ण मनुष्य" बन गया। पर एक दिन इस संतोष में एक दरार पड़ती है — एक "मानसिक भूकंप"।
मैं अपने घर में जनमा था, पला था। अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की पा, बड़ा हुआ था। इस तरह मैं समझ रहा था कि मैं अपने में अब पूरा हो गया हूँ, पूरा मनुष्य हो गया हूँ। वाह कैसी सुंदर, कैसी संगठित और कैसी है मेरी स्थिति! एक दिन आनंद की इस दीवार में एक पड़ गई और तब मुझे सोचना पड़ा कि अपने घर, अपने पड़ोस, अपने नगर की सीमाओं में ममता, सहारा, ज्ञान और आनंद के उपहार पाकर भी मेरी स्थिति एकदम हीन है और हीन भी इतनी कि मेरा कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है— एक मामूली अपराधी की तरह। क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई? जी हाँ, एक भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई और लीजिए, आपको कोई नया प्रश्न न पूछना पड़े, इसलिए मैं अपनी ओर से ही कह रहा हूँ कि यह दीवार थी मानसिक विचारों की; इसलिए यह भूकंप भी किसी प्रांत या प्रदेश में नहीं उठा, मेरे मानस में ही उठा था।
मुझे सोचना पड़ा कि अपने घर, पड़ोस, नगर की सीमाओं में सब उपहार पाकर भी मेरी स्थिति एकदम है— इतनी हीन कि मेरा कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है। मानस में भूकंप उठा था? हाँ जी, में भूकंप उठा था और भूकंप में क्या कोई धरती थोड़े ही हिली थी, आकाश थोड़े ही काँपा था— एक पुरुष का अनुभव ही वह भूकंप था, जिसने मुझे हिला दिया।
रुकिए और सोचिए —
"आनंद की दीवार में दरार" का क्या अर्थ है?
लेखक कहता है कि "भूकंप मेरे मानस में उठा था।" यह "मानसिक भूकंप" किस अनुभव से आया, और उसने लेखक की सोच कैसे बदली?
Take a moment to form your answer before reading further.
Q1.अपने घर-पड़ोस-नगर से जुड़कर लेखक ने पहले स्वयं को कैसा समझा था?
भाग १ — पूर्णता में एक दरार
निबंध की शुरुआत में लेखक बताता है कि वह घर → पड़ोस → नगर से जुड़कर एक "पूर्ण मनुष्य" बन गया। पर एक दिन इस संतोष में एक दरार पड़ती है — एक "मानसिक भूकंप"।
मैं अपने घर में जनमा था, पला था। अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की पा, बड़ा हुआ था। इस तरह मैं समझ रहा था कि मैं अपने में अब पूरा हो गया हूँ, पूरा मनुष्य हो गया हूँ। वाह कैसी सुंदर, कैसी संगठित और कैसी है मेरी स्थिति! एक दिन आनंद की इस दीवार में एक पड़ गई और तब मुझे सोचना पड़ा कि अपने घर, अपने पड़ोस, अपने नगर की सीमाओं में ममता, सहारा, ज्ञान और आनंद के उपहार पाकर भी मेरी स्थिति एकदम हीन है और हीन भी इतनी कि मेरा कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है— एक मामूली अपराधी की तरह। क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई? जी हाँ, एक भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई और लीजिए, आपको कोई नया प्रश्न न पूछना पड़े, इसलिए मैं अपनी ओर से ही कह रहा हूँ कि यह दीवार थी मानसिक विचारों की; इसलिए यह भूकंप भी किसी प्रांत या प्रदेश में नहीं उठा, मेरे मानस में ही उठा था।
मुझे सोचना पड़ा कि अपने घर, पड़ोस, नगर की सीमाओं में सब उपहार पाकर भी मेरी स्थिति एकदम है— इतनी हीन कि मेरा कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है। मानस में भूकंप उठा था? हाँ जी, में भूकंप उठा था और भूकंप में क्या कोई धरती थोड़े ही हिली थी, आकाश थोड़े ही काँपा था— एक पुरुष का अनुभव ही वह भूकंप था, जिसने मुझे हिला दिया।
रुकिए और सोचिए —
"आनंद की दीवार में दरार" का क्या अर्थ है?
लेखक कहता है कि "भूकंप मेरे मानस में उठा था।" यह "मानसिक भूकंप" किस अनुभव से आया, और उसने लेखक की सोच कैसे बदली?
Take a moment to form your answer before reading further.
Q1.अपने घर-पड़ोस-नगर से जुड़कर लेखक ने पहले स्वयं को कैसा समझा था?