निबंध — भाग २
लेखक समझाता है कि "मैं और मेरा देश एक हैं", और हर नागरिक देश के लिए कुछ कर सकता है — क्योंकि महत्व कार्य की विशालता का नहीं, उसके पीछे की भावना का है। वह दो छोटी कहानियाँ सुनाता है।
मैंने जो कुछ जीवन में सीखा है, वह यही है कि महत्व किसी कार्य की में नहीं, उस कार्य के करने की भावना में है। बड़े से बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं, और छोटे से छोटा कार्य भी महान है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना है।
स्वामी रामतीर्थ जापान गए। रेल में एक स्टेशन पर रुके तो उनके मुँह से निकला— "जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।" एक जापानी युवक ने यह सुन लिया और दौड़कर एक ताज़े फल ले आया। फल भेंट करते हुए और दाम लेने से इनकार करते हुए उसने कहा— "आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।"
महान कमालपाशा उन दिनों अपने देश तुर्की के राष्ट्रपति थे। राजधानी में अपनी वर्षगाँठ का उत्सव समाप्त कर जब वे अपने भवन में ऊपर चले गए, तो एक बूढ़ा उन्हें वर्षगाँठ का उपहार भेंट करने आया। सेक्रेटरी ने कहा— अब तो समय बीत गया है। बूढ़े ने कहा— मैं तीस मील से पैदल चलकर आ रहा हूँ, इसलिए मुझे देर हो गई। राष्ट्रपति तक उसकी सूचना भेजी गई, कमालपाशा विश्राम के वस्त्र बदल चुके थे, वे उन्हीं कपड़ों में नीचे चले आए और उन्होंने बूढ़े किसान का उपहार स्वीकार किया। यह उपहार मिट्टी की छोटी में पाव-भर शहद था, जिसे बूढ़ा स्वयं तोड़कर लाया था। कमालपाशा ने हँडिया को स्वयं खोला और उसमें से दो उँगलियाँ भरकर चाटने के बाद तीसरी उँगली शहद में भरकर बूढ़े के मुँह में दे दी, बूढ़ा हो गया। राष्ट्रपति ने कहा— दादा, आज सर्वोत्तम उपहार तुमने मुझे भेंट किया क्योंकि इसमें तुम्हारे हृदय का शुद्ध प्यार है। क्या यह शहद बहुत कीमती था? क्या उसमें मोती-हीरे मिले हुए थे? ना, उस शहद के पीछे उसके लाने वाले की भावना थी जिसने उसे सौ लालों का एक लाल बना दिया।
हमारे देश में भी एक ऐसी ही घटना घटी थी। एक किसान ने रंगीन सुतलियों से एक बुनी और उसे रेल में रखकर वह दिल्ली लाया। दिल्ली स्टेशन से उस खाट को अपने कंधे पर रखे वह भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की कोठी पर पहुँचा। पंडितजी कोठी से बाहर आए तो वह खाट उसने उन्हें दी। पंडितजी ने पूछा कि क्या चाहते हो तुम? उसने कहा, यही कि आप इसे स्वीकार करें। प्रधानमंत्री ने उसका यह उपहार स्वीकार ही नहीं किया, अपना एक फोटो दस्तखत कर उसे स्वयं उपहार में दिया— दस्तखती फोटो के लिए देश के बड़े-बड़े लोग, विद्वान और धनी तरसते हैं! वह क्या उस मामूली खाट के बदले में दिया गया था? ना, वह तो उस खाट वाले की भावना का ही सम्मान था।
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ से फलों के बदले क्या "माँगा"?
इस पृष्ठ पर आपने तीन छोटी कहानियाँ पढ़ीं — जापानी युवक का टोकरी भर फल, देहाती बूढ़े का पाव-भर शहद, और किसान की रंगीन खाट। तीनों उपहार मूल्य में बहुत मामूली थे, फिर भी "सर्वोत्तम" कहलाए। इन तीनों में कौन-सी एक बात समान (common) है, जो उन्हें महान बनाती है?
Take a moment to form your answer before reading further.
Q1.निबंध की केंद्रीय सीख क्या है?
लेखक समझाता है कि "मैं और मेरा देश एक हैं", और हर नागरिक देश के लिए कुछ कर सकता है — क्योंकि महत्व कार्य की विशालता का नहीं, उसके पीछे की भावना का है। वह दो छोटी कहानियाँ सुनाता है।
मैंने जो कुछ जीवन में सीखा है, वह यही है कि महत्व किसी कार्य की में नहीं, उस कार्य के करने की भावना में है। बड़े से बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं, और छोटे से छोटा कार्य भी महान है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना है।
स्वामी रामतीर्थ जापान गए। रेल में एक स्टेशन पर रुके तो उनके मुँह से निकला— "जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।" एक जापानी युवक ने यह सुन लिया और दौड़कर एक ताज़े फल ले आया। फल भेंट करते हुए और दाम लेने से इनकार करते हुए उसने कहा— "आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।"
महान कमालपाशा उन दिनों अपने देश तुर्की के राष्ट्रपति थे। राजधानी में अपनी वर्षगाँठ का उत्सव समाप्त कर जब वे अपने भवन में ऊपर चले गए, तो एक बूढ़ा उन्हें वर्षगाँठ का उपहार भेंट करने आया। सेक्रेटरी ने कहा— अब तो समय बीत गया है। बूढ़े ने कहा— मैं तीस मील से पैदल चलकर आ रहा हूँ, इसलिए मुझे देर हो गई। राष्ट्रपति तक उसकी सूचना भेजी गई, कमालपाशा विश्राम के वस्त्र बदल चुके थे, वे उन्हीं कपड़ों में नीचे चले आए और उन्होंने बूढ़े किसान का उपहार स्वीकार किया। यह उपहार मिट्टी की छोटी में पाव-भर शहद था, जिसे बूढ़ा स्वयं तोड़कर लाया था। कमालपाशा ने हँडिया को स्वयं खोला और उसमें से दो उँगलियाँ भरकर चाटने के बाद तीसरी उँगली शहद में भरकर बूढ़े के मुँह में दे दी, बूढ़ा हो गया। राष्ट्रपति ने कहा— दादा, आज सर्वोत्तम उपहार तुमने मुझे भेंट किया क्योंकि इसमें तुम्हारे हृदय का शुद्ध प्यार है। क्या यह शहद बहुत कीमती था? क्या उसमें मोती-हीरे मिले हुए थे? ना, उस शहद के पीछे उसके लाने वाले की भावना थी जिसने उसे सौ लालों का एक लाल बना दिया।
हमारे देश में भी एक ऐसी ही घटना घटी थी। एक किसान ने रंगीन सुतलियों से एक बुनी और उसे रेल में रखकर वह दिल्ली लाया। दिल्ली स्टेशन से उस खाट को अपने कंधे पर रखे वह भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की कोठी पर पहुँचा। पंडितजी कोठी से बाहर आए तो वह खाट उसने उन्हें दी। पंडितजी ने पूछा कि क्या चाहते हो तुम? उसने कहा, यही कि आप इसे स्वीकार करें। प्रधानमंत्री ने उसका यह उपहार स्वीकार ही नहीं किया, अपना एक फोटो दस्तखत कर उसे स्वयं उपहार में दिया— दस्तखती फोटो के लिए देश के बड़े-बड़े लोग, विद्वान और धनी तरसते हैं! वह क्या उस मामूली खाट के बदले में दिया गया था? ना, वह तो उस खाट वाले की भावना का ही सम्मान था।
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ से फलों के बदले क्या "माँगा"?
इस पृष्ठ पर आपने तीन छोटी कहानियाँ पढ़ीं — जापानी युवक का टोकरी भर फल, देहाती बूढ़े का पाव-भर शहद, और किसान की रंगीन खाट। तीनों उपहार मूल्य में बहुत मामूली थे, फिर भी "सर्वोत्तम" कहलाए। इन तीनों में कौन-सी एक बात समान (common) है, जो उन्हें महान बनाती है?
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Q1.निबंध की केंद्रीय सीख क्या है?