कहानी — भाग २–३
भाग २ — अपमान, और एक छोटी-सी दोस्त
गया अब बैलों से कड़ा बरताव करता है — मारता है, सूखा भूसा देता है। बैलों का स्वाभिमान आहत होता है। इसी बीच उन्हें एक नन्ही दोस्त मिलती है — भैरो की बेटी, जिसकी माँ मर चुकी है।
हीरा ने में कहा– "भागना व्यर्थ है।" मोती ने उत्तर दिया– "तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।" उस वक़्त एक छोटी-सी लड़की दो रोटियाँ लिए निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गई। लड़की भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी। उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी।
छोटी लड़की को बैलों से अपनापन क्यों महसूस हुआ?
एक रात वही लड़की उनकी रस्सी खोल देती है ताकि वे भाग सकें। दोनों भागते हैं — पर रास्ता भटक जाते हैं। तभी सामने एक साँड़ आ जाता है।
मोती ने मूक-भाषा में कहा– "बुरे फँसे। जान बचेगी? कोई उपाय सोचो।" हीरा ने चिंतित स्वर में कहा– "अपने घमंड में भूला हुआ है। न सुनेगा।" "भाग क्यों न चलें?" "भागना है।" "उपाय यही है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी, तो भाग खड़ा होगा।"
साँड़ को संगठित शत्रुओं से लड़ने का न था। वह तो एक ही शत्रु से करने का आदी था। मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा में कहा– "मेरा जी तो चाहता था कि बच्चा को मार ही डालूँ।" हीरा ने किया– "गिरे हुए पर सींग न चलाना चाहिए।"
साँड़ अकेला और ताक़तवर था, फिर भी हीरा-मोती जीत गए। प्रेमचंद इससे आज़ादी की लड़ाई के बारे में क्या संकेत दे रहे हैं?
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Q1.बैलों को आज़ाद होने में किसने मदद की?
भाग २ — अपमान, और एक छोटी-सी दोस्त
गया अब बैलों से कड़ा बरताव करता है — मारता है, सूखा भूसा देता है। बैलों का स्वाभिमान आहत होता है। इसी बीच उन्हें एक नन्ही दोस्त मिलती है — भैरो की बेटी, जिसकी माँ मर चुकी है।
हीरा ने में कहा– "भागना व्यर्थ है।" मोती ने उत्तर दिया– "तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।" उस वक़्त एक छोटी-सी लड़की दो रोटियाँ लिए निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गई। लड़की भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी। उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी।
छोटी लड़की को बैलों से अपनापन क्यों महसूस हुआ?
एक रात वही लड़की उनकी रस्सी खोल देती है ताकि वे भाग सकें। दोनों भागते हैं — पर रास्ता भटक जाते हैं। तभी सामने एक साँड़ आ जाता है।
मोती ने मूक-भाषा में कहा– "बुरे फँसे। जान बचेगी? कोई उपाय सोचो।" हीरा ने चिंतित स्वर में कहा– "अपने घमंड में भूला हुआ है। न सुनेगा।" "भाग क्यों न चलें?" "भागना है।" "उपाय यही है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी, तो भाग खड़ा होगा।"
साँड़ को संगठित शत्रुओं से लड़ने का न था। वह तो एक ही शत्रु से करने का आदी था। मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा में कहा– "मेरा जी तो चाहता था कि बच्चा को मार ही डालूँ।" हीरा ने किया– "गिरे हुए पर सींग न चलाना चाहिए।"
साँड़ अकेला और ताक़तवर था, फिर भी हीरा-मोती जीत गए। प्रेमचंद इससे आज़ादी की लड़ाई के बारे में क्या संकेत दे रहे हैं?
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Q1.बैलों को आज़ाद होने में किसने मदद की?