कहानी — भाग ४–५
भाग ४–५ — काँजीहौस, और सच्ची आज़ादी
मटर के खेत में चरते समय मोती पकड़ा जाता है; हीरा साथ नहीं छोड़ता और ख़ुद भी पकड़ा जाता है। दोनों काँजीहौस (आवारा पशुओं की "जेल") में बंद कर दिए जाते हैं। यहीं कहानी अपने सबसे ऊँचे भाव तक पहुँचती है।
दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। रात को भी जब कुछ भोजन न मिला, तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला ।
बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मज़बूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिए और ज़ोर मारा, तो मिट्टी का एक निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ा। मोती ने पड़े-पड़े कहा– "आख़िर मार खाई, क्या मिला?" "जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।" "जान से हाथ धोना पड़ेगा।" "कुछ परवाह नहीं। सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जानें बच जातीं।"
रुकिए और सोचिए —
हीरा दीवार क्यों तोड़ रहा था?
हीरा आधी दीवार गिरा देता है। बाक़ी जानवर भाग निकलते हैं, पर मोती हीरा को अकेला छोड़कर नहीं जाता। चौकीदार आकर हीरा को मोटी रस्सी से बाँध देता है। फिर एक हफ़्ते बाद दोनों नीलाम कर दिए जाते हैं — एक कठोर दढ़ियल ख़रीदार के हाथ।
मोती गर्व से बोला– "जिस के लिए तुम्हारे गले में बंधन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिंता? इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।" हो जाने के बाद दोनों मित्र उस के साथ चले।
दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि यह परिचित राह है। वही खेत, वही बाग़, वही गाँव मिलने लगे। प्रतिक्षण उनकी चाल तेज़ होने लगी। सारी थकान, सारी ग़ायब हो गई। दोनों होकर बछड़ों की भाँति करते हुए घर की ओर दौड़े।
दढ़ियल कठोर ख़रीदार के सामने मोती कहता है — "मर जाऊँगा; पर उसके काम तो न आऊँगा।" यह एक बैल का कथन है, पर इसमें स्वतंत्रता-आंदोलन की कौन-सी भावना छिपी है?
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Q1.काँजीहौस से छूटने के बाद दोनों मित्र किसके हाथ नीलाम हुए?
भाग ४–५ — काँजीहौस, और सच्ची आज़ादी
मटर के खेत में चरते समय मोती पकड़ा जाता है; हीरा साथ नहीं छोड़ता और ख़ुद भी पकड़ा जाता है। दोनों काँजीहौस (आवारा पशुओं की "जेल") में बंद कर दिए जाते हैं। यहीं कहानी अपने सबसे ऊँचे भाव तक पहुँचती है।
दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। रात को भी जब कुछ भोजन न मिला, तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला ।
बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मज़बूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिए और ज़ोर मारा, तो मिट्टी का एक निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ा। मोती ने पड़े-पड़े कहा– "आख़िर मार खाई, क्या मिला?" "जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।" "जान से हाथ धोना पड़ेगा।" "कुछ परवाह नहीं। सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जानें बच जातीं।"
रुकिए और सोचिए —
हीरा दीवार क्यों तोड़ रहा था?
हीरा आधी दीवार गिरा देता है। बाक़ी जानवर भाग निकलते हैं, पर मोती हीरा को अकेला छोड़कर नहीं जाता। चौकीदार आकर हीरा को मोटी रस्सी से बाँध देता है। फिर एक हफ़्ते बाद दोनों नीलाम कर दिए जाते हैं — एक कठोर दढ़ियल ख़रीदार के हाथ।
मोती गर्व से बोला– "जिस के लिए तुम्हारे गले में बंधन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिंता? इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।" हो जाने के बाद दोनों मित्र उस के साथ चले।
दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि यह परिचित राह है। वही खेत, वही बाग़, वही गाँव मिलने लगे। प्रतिक्षण उनकी चाल तेज़ होने लगी। सारी थकान, सारी ग़ायब हो गई। दोनों होकर बछड़ों की भाँति करते हुए घर की ओर दौड़े।
दढ़ियल कठोर ख़रीदार के सामने मोती कहता है — "मर जाऊँगा; पर उसके काम तो न आऊँगा।" यह एक बैल का कथन है, पर इसमें स्वतंत्रता-आंदोलन की कौन-सी भावना छिपी है?
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Q1.काँजीहौस से छूटने के बाद दोनों मित्र किसके हाथ नीलाम हुए?